Friday, October 12, 2012

उपसंहार

वैसे तो एक बाबा हुए थे जिनकी तीसरी आँख काफी चर्चा में रही। परंतु मेरे इस ब्लॉग का उनसे कुछ लेना देना नही है। कारण बिल्कुल स्फटिक की तरह स्पष्ट है। ज्यादातर लोग, खास कर अभियंता (यथार्थ व फर्जी), इस बात से तो अच्छी तरह से परिचित होंगे कि तीसरी आँख का आशय क्या होता है। तभी तो उनकी हरेक चर्चा में इस आँख की चर्चा जरूर होती है (उदाहरण के तौर पर माँ की आँख इत्यादि)। जाहिर सी बात है, इस आँख में मेरी बहुत ज्यादा दिलचस्पी नही है। इसीलिये बाबा की चौथी आँख - अस्तित्वविहीन। ढ़ूँढ़ते रहो; मिल जाये तो राम, ना मिले तो बड़े लोगों की बात - जो कि ऐसे ही समझ में नही आती।
देखने वाली बात है कि पहली ही प्रविष्टि का शीर्षक 'उपसंहर' है। देखने वाली बात यह भी है कि दुनिया गोल (लगभग) है। चक्र भी गोल होता है, और कालचक्र भी। इसी चक्र के चक्रव्यूह में फँस कर कंस ने भी कृष्ण के छह भाईयों की अकारण हत्या कर दी। जब भगवान के उस मामा को इस चक्र के आरम्भ और अंत का ज्ञात नही हुआ, तो मैं तो बहुत क्षुद्र प्राणी हूँ। मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं प्रस्तावना के पड़ाव पर हूँ या उपसंहार के। मेरे लिये तो दोनों एक ही हैं - जैसे अल्लाह और ईश्वर, जैसे राम और श्याम। और आखिर एक का अंत ही तो दूसरे की शुरुआत होती है। शायद यह भी कोई शुरुआत ही हो। या शायद अंत।
और बाबा किसी घोटाले में ना पकड़े गये तो फिर मिलेंगे। तब तक के लिये चौथी आँख को निद्रा देवी के आगोश में जाने देता हूँ। शब्बा खैर।

-- सिद्धार्थ

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